The Archive
A journey through thoughts from 2004 to 2025
Feb 22, 2014
ज़िन्दगी मुस्कराती है
जाने फिर क्यों आँख भर आती है।
छोटा सा आचल, थोड़े से सपने,
जाने फिर क्यों राहें भटक जाती है।
ज़िन्दगी कुछ समझाना चाहती है ,
जाने क्या सीखना चाहती है।
जाने फिर क्यों आँख भर आती है।
छोटा सा आचल, थोड़े से सपने,
जाने फिर क्यों राहें भटक जाती है।
ज़िन्दगी कुछ समझाना चाहती है ,
जाने क्या सीखना चाहती है।