Feb 8, 2026
कुछ घाव मुट्ठी में समेटे रखे थे,
आशाएं कुछ पुरानी सिरहाने टिकाई थी,
मुट्ठी जब खोली तो संग आशाएं भी फिसल गयी |
फिर ज़िन्दगी क्यों कुछ समझाना चाहती है ?
नहीं सखीना मुझे
दो पल रुखके, खुश होकर जीना है मुझे |
A journey through thoughts from 2004 to 2025