कुछ घाव मुट्ठी में  समेटे रखे थे,
आशाएं कुछ पुरानी सिरहाने टिकाई थी, 

मुट्ठी जब खोली तो संग आशाएं भी फिसल गयी | 


फिर ज़िन्दगी क्यों कुछ समझाना चाहती है ? 
नहीं सखीना मुझे 
दो पल रुखके, खुश होकर जीना है मुझे |